विश्वरूपदर्शनयोग
विश्वरूप दर्शन योग
Vision of Cosmic Form
Chapter 11 Verses
अर्जुन उवाच | मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् | यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम || ११-१||
अर्जुन बोले - मेरे ऊपर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गुह्य अध्यात्म संबंधी वचन कहे हैं, उनसे मेरा यह मोह दूर हो गया है।
Arjuna said: By Your words of supreme secret concerning the Self, spoken for my welfare, this delusion of mine has been dispelled.
अर्जुन उवाच | त्वयोक्तं वचनं इदं तत्त्वमध्यात्मसंज्ञितम् | येन मोहो ऽयं विगतो मम || ११.२ ||
अर्जुन बोले - आपके द्वारा कहे गए ये वचन हैं जो तत्त्व और अध्यात्म के नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनसे मेरा यह मोह दूर हो गया है।
Arjuna said: By these words of Yours concerning the supreme spiritual truth, spoken out of compassion for me, my delusion has been dispelled.
श्रीभगवानुवाच | पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः | नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च || ११.३||
श्री भगवान बोले - हे पार्थ! मेरे सैकड़ों और हजारों रूपों को देखो जो अनेक प्रकार के, दिव्य और नाना वर्ण तथा आकृतियों वाले हैं।
The Supreme Lord said: Behold, O Arjuna, My divine forms in hundreds and thousands, of various kinds, divine, and of different colors and shapes.
अर्जुन उवाच || यदि तत् शक्यं मया द्रष्टुमिति मन्यसे प्रभो | योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् || 4||
अर्जुन बोले - हे प्रभो! यदि आप समझते हैं कि वह रूप मेरे द्वारा देखा जा सकता है, तो हे योगेश्वर! आप मुझे अपने उस अविनाशी रूप का दर्शन कराइये।
Arjuna said: O Lord, if You think it is possible for me to see this, then O Master of yoga, please reveal to me Your imperishable cosmic form.
श्रीभगवानुवाच | पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः | नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च || ५||
श्री भगवान बोले - हे पार्थ! मेरे सैकड़ों और हजारों रूपों को देखो, जो अनेक प्रकार के, दिव्य और नाना वर्ण तथा आकृतियों वाले हैं।
The Supreme Lord said: Behold, O Arjuna, My divine forms by the hundreds and thousands, of various kinds, divine and of various colors and shapes.
श्रीभगवानुवाच। पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः। नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ६॥
हे पार्थ! मेरे सैकड़ों और हजारों प्रकार के, अनेक विधियों वाले, दिव्य और अनेक वर्ण तथा आकृतियों वाले रूपों को देख।
Behold, O Partha, hundreds and thousands of My divine forms of various kinds, colors and shapes.
श्री भगवान् उवाच | पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः | नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च || ७||
भगवान बोले - हे पार्थ! मेरे सैकड़ों और हजारों रूपों को देखो जो विविध प्रकार के, दिव्य और नाना वर्ण-आकृति वाले हैं।
The Blessed Lord said: Behold, O Partha, My forms by hundreds and by thousands, manifold, divine, of various colors and shapes.
श्रीभगवानुवाच | न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा | दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् || ८||
श्री भगवान बोले - परन्तु तू इन अपने नेत्रों से मुझे देखने में समर्थ नहीं है। मैं तुझे दिव्य नेत्र देता हूँ, मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख।
The Blessed Lord said: But you cannot see Me with these your physical eyes. I give you divine sight; behold My supreme yogic power.
संजय उवाच | एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः | दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् || 9||
संजय ने कहा - हे राजन्! इस प्रकार कहकर महायोगेश्वर भगवान् हरि ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्यमय रूप दिखाया।
Sanjaya said: Having spoken thus, O King, the great Lord of Yoga, Hari (Krishna), showed Arjuna His supreme divine form.
अर्जुन उवाच ॥ पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् । ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १० ॥
अर्जुन ने कहा - हे देव! मैं आपके दिव्य शरीर में सभी देवताओं को और सब प्रकार के भूतों के समुदायों को देख रहा हूँ। कमलासन पर विराजमान ब्रह्मा जी को, शिव जी को, सभी ऋषियों को और दिव्य सर्पों को भी देख रहा हूँ।
Arjuna said: O Lord, I see within Your divine body all the gods and various hosts of beings, Brahma seated on his lotus throne, Lord Shiva, all the sages, and the divine serpents.
अर्जुन उवाच | मद्गतप्राणा बहवो मद्भक्ता विगतज्वराः | मामेवैष्यन्ति परां गतिं यान्ति महात्मनः || ११||
अर्जुन बोले - हे प्रभु! मैं आपके इस दिव्य रूप को देखकर अत्यंत प्रसन्न हूं। जो मुझे पहले कभी दिखाई नहीं दिया था, वह आज मैंने देखा है।
Arjuna said: O Lord, I am delighted to see this divine form of Yours which I have never seen before. I am filled with joy, yet my mind trembles with fear.
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥ १२॥
यदि आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदय हों, तो वह प्रकाश उस परम पुरुष के तेज के समान हो सकता है।
If the radiance of a thousand suns were to burst forth at once in the sky, that would be like the splendor of that mighty Being.
अर्जुन उवाच || तत्र एकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ||१३||
अर्जुन बोले - उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुन ने देवों के देव के शरीर में एक ही स्थान पर स्थित सम्पूर्ण जगत को अनेक प्रकार से विभक्त देखा।
Arjuna said: There Pandava (Arjuna) beheld the entire universe with its manifold divisions, all united in the one body of the God of gods.
अर्जुन उवाच | ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः | प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत || १४ ||
अर्जुन बोले - तब वह धनञ्जय अर्जुन विस्मय से भरकर, रोमांचित होकर, भगवान को सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोला।
Arjuna said: Then Dhananjaya (Arjuna), filled with wonder and his hair standing on end, bowed his head to the Divine Lord and spoke with joined palms.
अर्जुन उवाच | पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् | ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् || १५ ||
अर्जुन बोले - हे देव! मैं आपके दिव्य शरीर में सभी देवताओं को तथा समस्त प्राणियों के विशेष समुदायों को देख रहा हूँ। कमल के आसन पर स्थित ब्रह्मा जी को, शिव जी को तथा सभी ऋषियों और दिव्य सर्पों को भी देख रहा हूँ।
Arjuna said: O Lord, I behold within Your body all the gods and the multitude of beings, Brahma seated on the lotus throne, Lord Shiva, all the sages, and the divine serpents.
अर्जुन उवाच। अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्। नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप।। 16।।
अर्जुन बोले - हे विश्वेश्वर! हे विश्वरूप! मैं आपको अनेक भुजाओं, पेट, मुख और नेत्रों वाला तथा सब ओर से अनन्त रूप वाला देख रहा हूँ। आपका न तो अन्त दिखाई देता है, न मध्य और न आदि ही दिखाई देता है।
Arjuna said: O Lord of the universe, O cosmic form, I see You everywhere with infinite forms, with many arms, stomachs, mouths and eyes. I see neither Your end nor Your middle nor Your beginning.
अर्जुन उवाच ।। किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ।। १७ ।।
अर्जुन ने कहा - आपको मुकुट, गदा और चक्र धारण किये हुए, तेज के समूह से युक्त और सब ओर से प्रकाशमान, कठिनता से देखे जाने योग्य, सब ओर से प्रज्वलित अग्नि और सूर्य की भाँति प्रकाशयुक्त तथा अप्रमेय देख रहा हूँ।
Arjuna said: I see You bearing a crown, mace and discus, a mass of radiance shining everywhere, difficult to behold on all sides, blazing like a burning fire and the sun, and immeasurable.
अर्जुन उवाच || त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् | त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे || १८||
अर्जुन बोले - आप ही अक्षर परब्रह्म हैं जो जानने योग्य है, आप ही इस समस्त जगत के परम आश्रय हैं। आप अविनाशी हैं, शाश्वत धर्म के रक्षक हैं, आप ही सनातन पुरुष हैं - यह मेरा मत है।
Arjuna said: You are the imperishable, the supreme reality to be known. You are the ultimate refuge of this universe. You are the eternal guardian of dharma, the primeval divine being - this is my conviction.
अर्जुन उवाच || अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं ससिसूर्यनेत्रम्। पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।। १९ ।।
अर्जुन बोले - हे प्रभु! मैं आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त पराक्रमवाला, अनेक भुजाओंवाला, चन्द्र और सूर्य रूप नेत्रोंवाला देख रहा हूँ। आपके प्रज्वलित अग्नि के समान मुखों को और अपने तेज से इस सम्पूर्ण जगत् को तपाते हुए देख रहा हूँ।
Arjuna said: I see You without beginning, middle or end, infinite in power, with countless arms, having the sun and moon as Your eyes, with blazing fire as Your mouth, heating this entire universe with Your radiance.
अर्जुन उवाच ॥ द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २० ॥
अर्जुन बोले- हे महात्मा! आकाश और पृथ्वी के बीच का यह सारा स्थान और सभी दिशाएं आपके एक ही रूप से व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक व्याकुल हो रहे हैं।
Arjuna said: O Great Soul! The space between heaven and earth and all the directions are pervaded by You alone. Seeing this wondrous and terrible form of Yours, the three worlds are trembling with fear.
अर्जुन उवाच। रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्। बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २१ ॥
अर्जुन ने कहा - हे महाबाहो! आपके बहुत से मुख और नेत्रों वाले, बहुत से हाथ, जांघ और पैर वाले, बहुत से उदर वाले और बहुत से दांतों से युक्त भयानक रूप को देखकर सभी लोक व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूं।
Arjuna said: O mighty-armed one, seeing Your immense form with many mouths and eyes, with many arms, thighs and feet, with many bellies and fearful with many teeth, all the worlds are terrified and so am I.
अर्जुन उवाच || रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् | बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् || २२||
अर्जुन बोले - हे महाबाहो! आपके अनेक मुख और नेत्रों वाले, अनेक भुजाओं, जंघाओं और पैरों वाले, अनेक उदरों वाले और अनेक भयंकर दाँतों वाले इस विराट रूप को देखकर सभी लोक व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हूँ।
Arjuna said: O mighty-armed Lord, seeing Your immense form with many mouths and eyes, many arms, thighs and feet, many bellies, and many fearsome teeth, all the worlds are trembling with fear, and so am I.
अर्जुन उवाच | रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् | बहुदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् || २३ ||
अर्जुन बोले - हे महाबाहो! आपके इस महान्, अनेक मुख और नेत्रों वाले, अनेक भुजाओं, जंघाओं और पैरों वाले, अनेक उदरों वाले और अनेक भयानक दांतों वाले रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।
Arjuna said: O mighty-armed one, seeing Your great form with many faces and eyes, many arms, thighs and feet, many bellies, and many terrible tusks, the worlds are terrified, and so am I.
अर्जुन उवाच | नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् | दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो || २४||
अर्जुन ने कहा - हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, प्रकाशमान, अनेक वर्णों वाले, फैले हुए मुख वाले और प्रकाशमान विशाल नेत्रों वाले आपके इस रूप को देखकर मेरा अन्तरात्मा व्याकुल हो गया है और मैं धैर्य तथा शान्ति नहीं पा रहा हूँ।
Arjuna said: O Vishnu! Seeing this form of Yours touching the sky, blazing with many colors, with gaping mouths and large glowing eyes, my inner self is disturbed and I can find neither steadiness nor peace.
अर्जुन उवाच || दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । न जाने दिशो न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ||२५||
अर्जुन बोले - आपके भयानक दाँतों वाले मुखों को देखकर जो कालाग्नि के समान प्रकाशित हो रहे हैं, मैं न तो दिशाओं को जान पा रहा हूँ और न ही शांति पा रहा हूँ। हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।
Arjuna said: O Lord of lords, O refuge of the worlds, please be gracious to me. I cannot maintain my equilibrium. Seeing these terrible faces with fearsome teeth, glowing like the fires of cosmic dissolution, I am bewildered and can find no peace.
अर्जुन उवाच || अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः। भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ २६॥
अर्जुन बोले - हे प्रभो! ये सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित, भीष्म, द्रोण और सूतपुत्र कर्ण तथा हमारे पक्ष के प्रमुख योद्धा भी आपके मुख में प्रवेश कर रहे हैं।
Arjuna said: I see all these sons of Dhritarashtra along with hosts of kings, Bhishma, Drona, Karna the son of a charioteer, and our chief warriors too, rushing into Your mouths.
अर्जुन उवाच || दृष्ट्वा इमं स्वरूपं घोरमीदृशं तव प्रभो | प्रकृतिः सा मे हृदयं प्रह्रष्टो ह्यस्मि पुनः || २७||
अर्जुन बोले - हे प्रभो! आपके इस भयंकर रूप को देखकर मेरा चित्त व्याकुल हो गया है और मैं प्रसन्नता को प्राप्त नहीं हो सकता।
Arjuna said: Seeing this terrible form of Yours, O Lord, my mind is disturbed and I cannot maintain my composure.
अर्जुन उवाच || यथा नदीनां बहवो ऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति | तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ||२८||
अर्जुन ने कहा - जैसे नदियों के अनेक जल-प्रवाह समुद्र की ओर दौड़ते हैं, वैसे ही ये मनुष्यलोक के वीर आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
Arjuna said: As the many torrents of rivers flow toward the ocean, so do these heroes of the mortal world enter into Your blazing mouths.
अर्जुन उवाच || नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो || २९||
अर्जुन बोले - हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, दीप्तिमान, अनेक वर्णों वाले, फैले हुए मुखों वाले और दीप्तिमान विशाल नेत्रों वाले आपके इस रूप को देखकर मेरा अंतःकरण अत्यंत व्याकुल हो गया है और मुझे न तो धैर्य मिलता है और न ही शांति।
Arjuna said: O Vishnu! Seeing Your form touching the sky, blazing with many colors, with gaping mouths and large glowing eyes, my inner self is greatly disturbed and I can find neither steadiness nor peace.
अर्जुन उवाच।। नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ।। ३०।।
अर्जुन बोले - हे विष्णु! आकाश को स्पर्श करने वाले, दीप्तिमान, अनेक वर्णों वाले, खुले हुए मुखों वाले, दीप्तिमान विशाल नेत्रों वाले आपको देखकर मेरा अन्तःकरण व्याकुल हो रहा है। मैं धैर्य और शान्ति नहीं पा रहा हूँ।
Arjuna said: O Vishnu! Seeing You touching the sky, blazing with many colors, with mouth wide open and large glowing eyes, my inner self is disturbed and I can find neither steadiness nor peace.
अर्जुन उवाच || आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमो'स्तु ते देववर प्रसीद | विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् || 31||
अर्जुन ने कहा - हे देव! आप कौन हैं? कृपया मुझे बताइए कि आप कौन हैं जो इस भयानक रूप में हैं। आपको नमस्कार है, हे देवों के देव! कृपा करें। मैं आपको आदि पुरुष के रूप में जानना चाहता हूं, क्योंकि मैं आपकी इस प्रवृत्ति को नहीं समझ पा रहा हूं।
Arjuna said: Tell me who You are, so fierce of form! Salutations to You, O Supreme God, be gracious! I wish to know You, the Primal Being, for I do not comprehend Your workings.
श्रीभगवानुवाच। कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥३२॥
श्री भगवान बोले - मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूं और इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हूं। तुम्हारे बिना भी जो योद्धा शत्रु पक्ष की सेनाओं में स्थित हैं, वे सब नहीं रहेंगे।
The Supreme Lord said: I am Time, the destroyer of worlds, grown mighty, engaged in destroying these worlds. Even without you, all the warriors arrayed in the opposing armies shall cease to exist.
अर्जुन उवाच || तस्माद्युक्तमेव त्वयि जगत्प्रह्ऋष्यत्यनुराज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥३३॥
अर्जुन ने कहा - इसलिए यह उचित ही है कि तुम्हारे स्तवन से संसार हर्षित होता है और अनुराग करता है। राक्षस भयभीत होकर सब दिशाओं में भागते हैं और सिद्धों के समुदाय सब तुम्हें नमस्कार करते हैं।
Arjuna said: It is indeed fitting that the world rejoices and is filled with love when glorifying You. The demons flee in fear to all directions, and all the hosts of perfected beings bow down to You.
अर्जुन उवाच || दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन | इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः || 34||
अर्जुन ने कहा - हे जनार्दन! आपके इस मनुष्य रूप को देखकर जो कि अत्यंत सुंदर और कोमल है, अब मैं शांत हो गया हूं और अपनी सामान्य चेतना में वापस आ गया हूं।
Arjuna said: O Janardana, having seen this human form of Yours, which is very beautiful and gentle, I am now composed and my mind has returned to its normal state.
अर्जुन उवाच | दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन | इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः || ३५ ||
अर्जुन बोले - हे जनार्दन! आपके इस सौम्य मानव रूप को देखकर अब मैं शांत चित्त हो गया हूं और अपनी प्रकृति को प्राप्त हो गया हूं।
Arjuna said: Having seen this gentle human form of Yours, O Janardana, I am now composed in mind and restored to my normal state.
अर्जुन उवाच || स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च | रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः || ३६ ||
अर्जुन ने कहा: हे हृषीकेश! आपकी प्रशंसा से जगत प्रसन्न होता है और प्रेम करता है। भयभीत राक्षस सब दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं, यह उचित ही है।
Arjuna said: It is fitting, O Hrishikesha, that the world rejoices and is attracted by Your praise. The demons flee in fear to all directions, while all the perfected beings bow down to You.
अर्जुन उवाच || कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे | अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् || ३७ ||
अर्जुन बोले - हे महात्मन्! आप ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ और आदि कर्ता हैं, तो आपको क्यों न नमस्कार करें? हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! आप अक्षर हैं, सत्-असत् से परे हैं।
Arjuna said: Why should they not bow to You, O great soul, who are greater than Brahma and the original creator? O infinite One, O Lord of gods, O abode of the universe! You are the imperishable, the being and non-being, and that which is beyond both.
अर्जुन उवाच ॥ वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च । नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥ ३८ ॥
अर्जुन बोले — आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजापति और प्रपितामह हैं। आपको हजारों बार नमस्कार हो, और फिर भी बारम्बार आपको नमस्कार है।
Arjuna said: You are Vayu (the wind-god), Yama (the god of death), Agni (the fire-god), Varuna (the water-god), the Moon, Prajapati (the creator), and the great-grandfather of all. Salutations to You a thousand times, and again and yet again salutations to You!
अर्जुन उवाच || वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च | नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते || ३९||
अर्जुन बोले - आप वायु हैं, यम हैं, अग्नि हैं, वरुण हैं, चन्द्रमा हैं, प्रजापति हैं और प्रपितामह (ब्रह्मा के भी पिता) हैं। आपको हजारों बार नमस्कार है, और फिर भी आपको बार-बार नमस्कार है।
Arjuna said: You are Vayu (the wind-god), Yama (the god of death), Agni (the fire-god), Varuna (the water-god), the Moon, Prajapati (the lord of creatures), and the great-grandfather (even of Brahma). Salutations to You a thousand times, and again and again salutations to You!
अर्जुन उवाच || नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥ ४० ॥
अर्जुन बोले - हे प्रभु! आपको आगे से भी नमस्कार है और पीछे से भी नमस्कार है, सब ओर से आपको नमस्कार है क्योंकि आप ही सब कुछ हैं। अनन्त शक्ति और अमित पराक्रम वाले आप सब कुछ में व्याप्त हैं, इसलिए आप ही सर्वस्व हैं।
Arjuna said: Salutations to You from the front and from behind! Salutations to You from all sides, O All! You are of infinite power and immeasurable prowess. You pervade all, therefore You are all.
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥४१॥
हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे - इस प्रकार आपको मित्र समझकर जो कुछ मैंने प्रेमवश या प्रमादवश कहा है, आपकी इस महिमा को न जानकर॥४१॥
Whatever I have said rashly, thinking You to be my friend and calling 'O Krishna, O Yadava, O friend!' - not knowing this glory of Yours, I spoke thus through negligence or through affection.
अर्जुन उवाच। पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्। न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव।। ४२।।
अर्जुन ने कहा - हे प्रभु! आप इस चराचर जगत के पिता हैं, आप इसके पूज्य और सबसे बड़े गुरु हैं। तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं है, आपसे बढ़कर कोई कैसे हो सकता है? हे अप्रतिम प्रभाव वाले!
Arjuna said: You are the Father of this world, moving and unmoving. You are its object of worship and the greatest teacher. None is equal to You in the three worlds; how can there be another superior to You, O Being of incomparable power?
अर्जुन उवाच। पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्। न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रये प्यप्रतिमप्रभाव।। ४३ ।।
हे प्रभु! आप इस चर और अचर जगत के पिता हैं, आप इसके पूज्य और श्रेष्ठ गुरु हैं। तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं है, आपसे बढ़कर कोई कैसे हो सकता है? आप अप्रतिम प्रभाव वाले हैं।
You are the father of this world of moving and non-moving beings; You are its revered and most worthy teacher. None equals You in the three worlds; how can there be one greater than You, O Being of incomparable power?
अर्जुन उवाच॥ पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्। न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥ ४४॥
अर्जुन ने कहा - हे प्रभो! आप इस चराचर जगत के पिता हैं तथा इसके पूज्य और श्रेष्ठतम गुरु हैं। तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं है, आपसे अधिक कोई कैसे हो सकता है? आप अप्रतिम प्रभावशाली हैं।
Arjuna said: You are the Father of this universe of the moving and non-moving; You are its adorable and most venerable Guru. None is equal to You in the three worlds; how then can there be another superior to You, O Being of incomparable glory!
अर्जुन उवाच || अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास || ४५||
अर्जुन ने कहा - पहले कभी न देखे गए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ और साथ ही भय से मेरा मन व्याकुल भी हो गया है। हे देव! आप मुझे वही (पहले वाला सौम्य) रूप दिखाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होइए।
Arjuna said: Having seen this form never seen before, I am filled with joy, yet my mind is disturbed with fear. O Lord, please show me that same (gentle) form. Be gracious, O Lord of gods, O abode of the universe.
अर्जुन उवाच। किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुं तथैव। तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ४६॥
अर्जुन बोले - हे सहस्रबाहो! हे विश्वमूर्ते! मैं आपको वैसे ही देखना चाहता हूँ जैसे आप मुकुट धारण किए हुए, गदा लिए हुए और हाथ में चक्र धारण किए हुए हैं। उसी चार भुजाओं वाले रूप में आप प्रकट हों।
Arjuna said: O thousand-armed one, O universal form, I wish to see You as before, crowned, holding the mace, with the discus in Your hand. Please appear in that same four-armed form.
श्रीभगवानुवाच। मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्। तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्॥ ४७॥
श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! मैंने प्रसन्न होकर अपनी योगशक्ति से तुझे यह परम दिव्य रूप दिखाया है, जो तेजोमय, विश्वरूप, अनन्त और आदि है तथा जो तुझसे पहले किसी अन्य ने नहीं देखा है।
The Supreme Lord said: O Arjuna, being pleased with you, I have shown you through My divine power this supreme cosmic form, which is radiant, universal, infinite, and primeval, and which has never been seen before by anyone other than you.
श्रीभगवानुवाच | न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः | एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुमन्येन त्वदन्येन कुरुप्रवीर || ४८||
श्री भगवान बोले - हे कुरुवीर! न वेदों के अध्ययन से, न यज्ञों से, न दानों से, न कर्मों से और न कठोर तपस्याओं से मैं इस रूप में इस मृत्युलोक में तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य के द्वारा देखा जा सकता हूँ।
The Blessed Lord said: O hero of the Kurus! Neither by study of the Vedas, nor by sacrifices, nor by charity, nor by rituals, nor by severe austerities, can I be seen in this form in the world of mortals by anyone other than you.
अर्जुन उवाच। दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन। इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः।। ४९।।
अर्जुन बोले - हे जनार्दन! आपके इस मनुष्य रूप को देखकर, जो अत्यंत सुंदर और शांत है, अब मैं चेतना में आ गया हूँ और अपनी सामान्य प्रकृति को प्राप्त हो गया हूँ।
Arjuna said: O Janardana, seeing this gentle human form of Yours, I am now composed and have returned to my normal nature.
संजय उवाच || इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः | आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा || ५० ||
संजय बोले - इस प्रकार अर्जुन से कहकर श्रीकृष्ण ने पुनः अपना स्वरूप दिखाया और उस डरे हुए अर्जुन को आश्वासन दिया, क्योंकि वे महात्मा पुनः अपने सुंदर रूप में आ गए थे।
Sanjaya said: Having thus spoken to Arjuna, Krishna again showed His own form. The great soul, assuming His gentle form, comforted the frightened Arjuna.
अर्जुन उवाच | दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन | इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः || 51||
अर्जुन बोले - हे जनार्दन! आपके इस सुंदर मानवीय रूप को देखकर अब मैं शांत हो गया हूँ और अपनी सामान्य चेतना को प्राप्त हो गया हूँ।
Arjuna said: O Janardana, seeing this gentle human form of Yours, I have now become composed and my mind has returned to its normal state.
अर्जुन उवाच | दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन | इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः || ५२ ||
अर्जुन बोले - हे जनार्दन! आपके इस सौम्य मानवीय रूप को देखकर अब मैं चेतना में आया हूँ और अपनी स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त हो गया हूँ।
Arjuna said: O Janardana, seeing this gentle human form of Yours, I have now become composed in mind and have returned to my natural state.
अर्जुन उवाच। दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन। इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥५३॥
अर्जुन ने कहा - हे जनार्दन! आपके इस मानवीय और सुन्दर रूप को देखकर अब मैं शान्त हो गया हूं और अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ गया हूं तथा मेरी चेतना भी ठीक हो गई है।
Arjuna said: O Janardana, seeing this gentle human form of Yours, I am now composed and have returned to my normal nature, and my consciousness has been restored.
अर्जुन उवाच || दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन | इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः || ५४||
अर्जुन बोले - हे जनार्दन! आपके इस मनुष्य रूप को देखकर जो सुन्दर और शान्त है, अब मैं सचेत हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ गया हूँ।
Arjuna said: O Janardana, having seen this gentle human form of Yours, I have now become composed in mind and restored to my natural state.
अर्जुन उवाच ॥ मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५ ॥
जो मेरे कार्यों को करने वाला, मुझमें परायण, मेरा भक्त, आसक्ति से रहित, सब प्राणियों के प्रति वैर-भाव से रहित है, हे पाण्डव! वह मुझे प्राप्त होता है।
He who does work for Me, who looks upon Me as his goal, who worships Me, free from attachment, who is without enmity towards all beings, he comes to Me, O Pandava.
Bhakti-centric Section · Devotion & Divine Nature
भक्ति · भक्तियोग / भक्ति · भक्ति और दिव्य प्रकृति
Nature of the divine, devotion, relationship between individual and ultimate reality.
ईश्वरस्वरूपम्, अनन्यभक्तिः, जीवपरमात्मनोः सम्बन्धश्च।
परमात्मा का स्वरूप, भक्ति, जीव और परम सत्य के बीच संबंध।