राजविद्याराजगुह्ययोग
राजविद्या राजगुह्य योग
Royal Knowledge
Chapter 9 Verses
श्रीभगवानुवाच | इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे | ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् || 1||
श्री भगवान बोले - हे निर्दोष! मैं तुझसे इस अत्यन्त गुह्य ज्ञान को कहूंगा जो विज्ञान सहित है, जिसे जानकर तू अशुभ से मुक्त हो जाएगा।
The Supreme Lord said: Because you are not envious, I shall now speak to you this most confidential knowledge combined with realization, knowing which you shall be freed from all inauspiciousness.
श्रीभगवानुवाच | राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् | प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् || 2||
भगवान श्री कृष्ण बोले - यह विद्या सभी विद्याओं की राजा है, यह गुह्य भी राजा है, यह अत्यंत पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाली, धर्ममय, करने में अत्यंत सुखकर और अक्षय है।
The Blessed Lord said: This knowledge is the king of all knowledge, the most secret of all secrets, supremely pure, directly realizable, righteous, very easy to practice, and imperishable.
श्रीभगवानुवाच। अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥ ३॥
जो लोग इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते, हे परन्तप! वे मुझको प्राप्त न करके मृत्यु और संसार के मार्ग में घूमते रहते हैं।
Those who have no faith in this dharma, O scorcher of enemies, fail to reach Me and return to the path of mortal worldly existence.
श्रीभगवानुवाच | मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना | मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ||४||
श्री भगवान बोले - मैं अपने अव्यक्त रूप से इस संपूर्ण जगत में व्याप्त हूँ। सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं, परंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
The Blessed Lord said: By Me, in My unmanifested form, all this universe is pervaded. All beings exist in Me, but I do not dwell in them.
श्रीभगवानुवाच। न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥ ५॥
और न ही सब भूत मुझमें स्थित हैं। मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख। मैं सभी भूतों का भरण-पोषण करने वाला हूं, परंतु भूतों में स्थित नहीं हूं। मेरी आत्मा सभी भूतों की उत्पत्ति का कारण है।
And yet beings do not dwell in Me—behold My divine mystery! My Self is the source and support of all beings, but I do not dwell in them.
श्रीभगवानुवाच। यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥ ६॥
जैसे सर्वत्र जाने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही सब भूत मुझमें स्थित हैं—ऐसा तू जान।
As the mighty wind, moving everywhere, perpetually dwells in space, so understand that all beings dwell in Me.
श्रीभगवानुवाच | सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् | कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || ७||
हे कुन्तीपुत्र! कल्प के अन्त में सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और कल्प के आदि में मैं उनको फिर उत्पन्न करता हूँ।
O son of Kunti, at the end of a cosmic cycle, all beings merge into My primordial nature, and at the beginning of the next cycle, I create them again.
श्रीभगवानुवाच | प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः | भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || ८||
भगवान श्रीकृष्ण बोले: अपनी प्रकृति को अधीन करके मैं बार-बार इस सम्पूर्ण प्राणिसमुदाय को उत्पन्न करता हूं, जो प्रकृति के वश में होकर स्वयं असमर्थ है।
The Supreme Lord said: Controlling My own nature, I repeatedly create this entire multitude of beings, which are powerless under the control of material nature.
श्रीभगवानुवाच | न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय | उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु || 9||
हे धनञ्जय! वे सब कर्म मुझे नहीं बांधते क्योंकि मैं उन कर्मों में आसक्ति रहित होकर उदासीन की भांति स्थित रहता हूं।
O Dhananjaya (Arjuna), these actions do not bind Me, for I remain detached from all actions, seated as one indifferent and unattached to the results of action.
श्रीभगवानुवाच। मय्याधायसर्वकर्माणि नित्ययुक्तो निराशिषः। मां परमेश्वरं प्राप्य पुनर्जन्म न विद्यते॥ १०॥
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा - जो व्यक्ति मुझमें मन को स्थापित करके, निरन्तर मेरे चिन्तन में लगा रहता है और आशा-अपेक्षा रहित होकर सभी कर्म करता है, वह मुझ परमेश्वर को प्राप्त करके पुनः जन्म नहीं लेता।
The Supreme Lord said: Those who constantly meditate on Me with exclusive devotion, fixing their minds upon Me alone, for them who are ever steadfast, I provide what they lack and preserve what they have.
श्री भगवानुवाच | अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् | परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् || ११||
श्री भगवान बोले - मूर्ख लोग मेरे मनुष्य रूप को देखकर मेरा तिरस्कार करते हैं, क्योंकि वे मेरे परम स्वरूप को नहीं जानते कि मैं समस्त प्राणियों का महान् ईश्वर हूँ।
The Supreme Lord said: Foolish people disregard Me when I appear in human form, not knowing My supreme nature as the great Lord of all beings.
श्री भगवानुवाच। मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥ १२॥
श्री भगवान बोले - निष्फल आशा वाले, निष्फल कर्म करने वाले और निष्फल ज्ञान वाले विवेकहीन मनुष्य राक्षसी और आसुरी तथा मोहिनी प्रकृति को धारण किए हुए हैं।
The Supreme Lord said: Those of futile hopes, futile actions, and futile knowledge, devoid of discrimination, are influenced by the deluding nature of demons and evil beings.
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥ १३॥
हे पार्थ! महात्मा पुरुष दैवी प्रकृति का आश्रय लेकर, मुझे सभी भूतों का आदि और अविनाशी जानकर, अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।
But the great souls, O Partha, partaking of My divine nature, worship Me with an undivided mind, knowing Me as the imperishable source of all beings.
श्रीभगवानुवाच। सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥ १४॥
निरन्तर मेरा कीर्तन करते हुए और दृढ़ व्रत वाले भक्तजन यत्न करते हुए तथा भक्ति सहित मुझे नमस्कार करते हुए, सदा योग में स्थित रहकर मेरी उपासना करते हैं।
Always chanting My glories and striving with firm resolve, bowing down to Me with devotion, the devotees worship Me with steadfast dedication.
श्री भगवानुवाच | ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते | एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् || १५ ||
और अन्य कई भक्तजन ज्ञान रूपी यज्ञ द्वारा मेरी उपासना करते हैं - कोई एकत्व भाव से, कोई पृथक्त्व भाव से और कोई अनेक प्रकार से सर्वव्यापी रूप में मेरी आराधना करते हैं।
Others also worship Me through the sacrifice of knowledge, some seeing Me as one, others as separate, and still others worship Me in My universal form manifested in many ways throughout the cosmos.
श्रीभगवानुवाच | अहं क्रतुरहं यज्ञो देवदानमहमुच्यते | अहं यज्ञफलं चाहं यज्ञकर्ता च केवलम् || 16||
श्री भगवान ने कहा - मैं ही क्रतु हूँ, मैं ही यज्ञ हूँ, मैं ही पितरों को दिया जाने वाला भोजन हूँ, मैं ही औषधि हूँ, मैं ही मन्त्र हूँ, मैं ही घी हूँ, मैं ही अग्नि हूँ और मैं ही होम हूँ।
The Supreme Lord said: I am the ritual, I am the sacrifice, I am the offering to the ancestors, I am the healing herb, I am the transcendental chant, I am the butter, I am the fire, and I am the offering.
श्रीभगवानुवाच। पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोंकार राजविद्या रजगुह्यम्।। १७।।
मैं इस जगत का पिता हूँ, माता हूँ, धारण करने वाला हूँ और पितामह हूँ। मैं जानने योग्य हूँ, पवित्र करने वाला हूँ, ओंकार हूँ, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद हूँ।
I am the father of this universe, the mother, the supporter, and the grandfather. I am the object of knowledge, the purifier, the sacred syllable Om, and the Rig, Sama, and Yajur Vedas.
श्रीभगवानुवाच। गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८॥
भगवान श्री कृष्ण बोले - मैं ही गति हूँ, भरण-पोषण करने वाला हूँ, स्वामी हूँ, साक्षी हूँ, निवास स्थान हूँ, शरण हूँ और सुहृद हूँ। मैं ही उत्पत्ति हूँ, प्रलय हूँ, स्थिति हूँ, आश्रय हूँ और अविनाशी बीज हूँ।
The Blessed Lord said: I am the goal, the supporter, the master, the witness, the abode, the refuge, and the most dear friend. I am the creation and the dissolution, the basis of everything, the resting place and the eternal seed.
श्री भगवानुवाच। तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥ १९॥
मैं ही सूर्य के रूप में तप देता हूँ, मैं ही वर्षा को रोकता और छोड़ता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत भी हूँ और मृत्यु भी हूँ तथा सत् और असत् दोनों भी मैं ही हूँ।
I give heat as the sun, I withhold and send forth rain. I am immortality and also death, existence and non-existence, O Arjuna.
श्री भगवानुवाच। त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥ २०॥
तीनों वेदों को जानने वाले, सोम पान करने वाले, पापरहित भक्त यज्ञों द्वारा मेरी पूजा करके स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं। वे पुण्य को प्राप्त करके इन्द्र के लोक में दिव्य भोगों को भोगते हैं।
Those who study the three Vedas, drink the soma juice, and are purified of sin worship Me through sacrifice, seeking the way to heaven. They reach the holy world of Indra and enjoy in heaven the divine pleasures of the gods.
श्री भगवानुवाच | ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति | एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते || 21||
वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर, पुण्य क्षीण हो जाने पर मृत्युलोक में आ जाते हैं। इस प्रकार त्रिविध वेदों के धर्म का आश्रय लेने वाले कामनाओं की प्राप्ति चाहने वाले आना-जाना प्राप्त करते हैं।
Having enjoyed the vast heavenly world, when their merit is exhausted, they return to the mortal world. Thus, following the threefold Vedic dharma, those who desire the objects of desires obtain the cycle of coming and going.
श्री भगवानुवाच | अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते | तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || २२||
जो मनुष्य अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य युक्त पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।
To those who worship Me with exclusive devotion, meditating on My transcendental form—to them I carry what they lack and preserve what they have.
श्रीभगवानुवाच | ये प्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः | तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् || २३ ||
जो भक्तजन श्रद्धा सहित अन्य देवताओं का भजन करते हैं, हे कुन्तीपुत्र! वे भी केवल मेरी ही पूजा करते हैं, परन्तु अविधिपूर्वक।
Those devotees who worship other gods with faith, they too worship Me alone, O son of Kunti, but not in accordance with the prescribed method.
श्री भगवानुवाच | अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च | न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते || २४||
मैं ही सभी यज्ञों का भोक्ता और स्वामी हूं। परन्तु वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए वे गिर जाते हैं।
I am the enjoyer and the only Lord of all sacrifices. But they do not know Me in truth, and therefore they fall.
श्री भगवानुवाच यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः | भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् || 25||
जो देवताओं की पूजा करते हैं वे देवताओं को प्राप्त होते हैं, जो पितरों की पूजा करते हैं वे पितरों को प्राप्त होते हैं, जो भूतों की पूजा करते हैं वे भूतों को प्राप्त होते हैं, और जो मेरी पूजा करते हैं वे मुझे प्राप्त होते हैं।
Those who worship the demigods go to the demigods; those who worship ancestors go to the ancestors; those who worship ghosts and spirits go to such beings; and those who worship Me come to Me.
श्री भगवानुवाच। पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ २६॥
श्री भगवान बोले - जो व्यक्ति मुझे भक्तिपूर्वक पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध हृदय भक्त का प्रेम से चढ़ाया गया भोग मैं स्वीकार करता हूँ।
The Supreme Lord said: Whoever offers Me with devotion a leaf, a flower, a fruit, or water, that offering made with love by one of pure heart, I accept.
श्रीभगवानुवाच | यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् | यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् || २७ ||
हे कुन्तीपुत्र! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ हवन करता है, जो कुछ दान देता है, जो कुछ तप करता है, वह सब कुछ मेरे अर्पण करके कर।
Whatever you do, whatever you eat, whatever you offer in sacrifice, whatever you give away, whatever austerities you practice - O son of Kunti, do that as an offering unto Me.
श्री भगवानुवाच। यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥२८॥
हे कुन्तीपुत्र! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ हवन करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब कुछ मेरे अर्पण करके कर।
Whatever you do, whatever you eat, whatever you offer in sacrifice, whatever you give away, whatever austerities you practice - do that, O son of Kunti, as an offering to Me.
श्रीभगवानुवाच | समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः | ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ||२९||
श्री भगवान बोले - मैं सभी प्राणियों में समान हूँ, न कोई मेरा द्वेषी है और न प्रिय। परन्तु जो मुझे भक्ति से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें हूँ।
The Blessed Lord said: I am equal to all beings; none is hateful or dear to Me. But those who worship Me with devotion are in Me, and I am also in them.
श्री भगवानुवाच। अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यो सम्यग्व्यवसितो हि सः।। ३०।।
यदि कोई अत्यंत दुराचारी भी मुझे अनन्य भक्ति से भजता है, तो वह साधु ही मानने योग्य है क्योंकि उसने उचित संकल्प कर लिया है।
Even if a person of very wicked conduct worships Me with undivided devotion, he is to be considered righteous, for he has made the right resolution.
श्री भगवानुवाच | क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति | कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति || ३१||
श्रीभगवान् बोले - वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और शाश्वत शान्ति को प्राप्त करता है। हे कुन्तीपुत्र! तू दृढ़तापूर्वक घोषणा कर कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।
The Blessed Lord said: Soon he becomes righteous and attains to everlasting peace. O son of Kunti, proclaim it boldly that My devotee never perishes.
अर्जुन उवाच ॥ अर्जुन उवाच ॥ यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥३२॥
हे कुन्तीपुत्र! मनुष्य अन्त समय में जिस-जिस भाव को स्मरण करता हुआ शरीर को त्यागता है, वह सदा उसी भाव से भावित होकर उसी को प्राप्त होता है।
Whatever state of being one remembers when he quits his body, that state he will attain without fail, O son of Kunti, being always absorbed in such contemplation.
श्री भगवानुवाच। किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा। अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३॥
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: फिर पुण्यशील ब्राह्मण और राजर्षि भक्तों का तो कहना ही क्या है। इस अनित्य और दुःखमय संसार को प्राप्त होकर तू मेरी भजना कर।
The Supreme Lord said: How much more easily then do the holy brahmanas and devoted royal sages attain Me! Having come to this temporary and miserable world, worship Me with devotion.
श्रीभगवानुवाच | मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः || ३४||
हे अर्जुन! तू मनसे मेरा चिन्तन कर, मेरा भक्त बन, मेरा यजन कर और मुझे प्रणाम कर। इस प्रकार अपने आत्मा को मेरे परायण करके तू निश्चय ही मुझे प्राप्त होगा।
Fix your mind on Me, be devoted to Me, sacrifice to Me, bow down to Me. Having thus united your self with Me by taking Me as the supreme goal, you shall certainly come to Me.
Bhakti-centric Section · Devotion & Divine Nature
भक्ति · भक्तियोग / भक्ति · भक्ति और दिव्य प्रकृति
Nature of the divine, devotion, relationship between individual and ultimate reality.
ईश्वरस्वरूपम्, अनन्यभक्तिः, जीवपरमात्मनोः सम्बन्धश्च।
परमात्मा का स्वरूप, भक्ति, जीव और परम सत्य के बीच संबंध।